संत नामदेव जी भगवान विट्ठळ के परम भक्त थे। ये सात वर्ष की उम्र से ही भगवान विट्ठळ के भजन गाने लगे थे। इनकी माता गोनाबाई हर दिन भगवान विट्ठळ जी को दूध का भोग लगाती थीं। एक दिन माता अपने काम में व्यस्त थीं तो पुत्र नामदेव को विट्ठळ भगवान को भोग लगाने को भेजा। नामदेव जी ने प्रेम से जब दूध का भोग भेट किया वैसे ही भगवान मूर्ती से प्रकट हो गये और पूरा दूध पी लिया।
अब नामदेव जी ने खुशी से यह वृत्तान्त माता को जाकर सुनाया। नामदेव जी की ये बातें सुन उनके माता पिता चकित हुए उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था। वे नामदेव को मन्दिर लेकर गये और पुनः भोग लगाने को कहा। नामदेव जी जब पुनः भगवान विट्ठळ को दूधका भोग लगाया वे प्रकट होकर दूध पीने लगे, यह देख उनके माता पिता आचंभित थे। परमात्मा अपने भक्तों की पुकार में तनिक भी विलम्ब नहीं करते, यही विट्ठळ की लीला है।
एक समय आप भगवान विट्ठळ के निमित्त रोटी बना रहे थे की तभी एक कुत्ता मुख में रोटी दबाकर भागने लगा आप उस कुत्ते के पीछे घी लेकर दौड़े। हे विट्ठळा! सूखी रोटी मत पाओ तनिक घी के साथ पाओ। इस भाव को देख भगवान कुत्ते में से प्रकट होना पड़ा।
एक बार एक ब्राह्मण देव आपको भजन के लिए निमंत्रित किया। आप अपने साथियों के साथ ब्राह्मण के घर जा रहे थे तभी मुस्लिम राजा ने आपको बंदी बना लिया और स्लाम कुबूल करने को बोला। उसने कहा यदि तुम स्लाम कुबूल नहीं करते तो अपनी भक्ती की शक्ती से इस मरी गाय को जिन्दा करके दिखाओ। नामदेव जी जब नही माने तो सुल्तान नामदेव जी को हाथी के पैरों तले कुचलने का आदेश दिया पर हाथी उन्हे देख शान्त होगया। अपने पुत्र की पीड़ा को देख माता ने कहा पुत्र परमात्मा एक ही है तू स्लाम कुबूल करले नहीं तो यह दुष्ट राजा तुझे मार देगा। तभी नामदेव जी ने उस मरी गाय को जीवित कर अपनी भक्ती की शक्ती का प्रमाण दिया। उनके इस कार्य से सुल्तान भी उनके सामने नतमस्तक हो गया।
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